न्यूज़ डेस्क : मैथिली समाज में मनाया जाने वाला जुड़ शीतल पर्व बड़े ही उत्साह और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हर साल 15 अप्रैल को मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन में शीतलता, संतुलन और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। खासतौर पर गर्मी की शुरुआत में मनाया जाने वाला यह त्योहार लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का भी माध्यम बनता है।
शीतलता और आस्था का प्रतीक
इस दिन लोग सुबह बासी जल से स्नान करते हैं और शीतला माता की विधि-विधान से पूजा करते हैं। पूजा के बाद एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर भी बासी भोजन अर्पित कर सिंदूर का टीका लगाया जाता है, जिससे परिवार को बीमारियों से सुरक्षित रखने की कामना की जाती है।
बड़ों का आशीर्वाद, परंपरा की पहचान
जुड़ शीतल की सबसे खास परंपरा है बड़ों द्वारा छोटों को आशीर्वाद देना। सुबह घर के बुजुर्ग परिवार के सदस्यों के सिर पर ठंडा पानी डालते हैं और ‘जुड़ायल रहु’ यानी सदा शीतल रहने का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा न केवल भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है, बल्कि भीषण गर्मी में शरीर को ठंडक देने का प्रतीक भी मानी जाती है।
बासी भोजन के पीछे छिपा विज्ञान
इस पर्व पर ताजा भोजन बनाने के बजाय एक दिन पहले तैयार किए गए व्यंजन खाने की परंपरा है। इसमें कढ़ी-बड़ी, भात, सत्तू, दही-चूड़ा और आम की चटनी जैसे व्यंजन शामिल होते हैं। भले ही यह परंपरा अलग लगे, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक सोच है—गर्मी की शुरुआत में ठंडा और हल्का भोजन शरीर को संतुलित रखने और पाचन तंत्र को आराम देने में मदद करता है।
प्रकृति से जुड़ने का संदेश
इस दिन लोग पेड़-पौधों की जड़ों में पानी डालते हैं और आसपास की सफाई करते हैं। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है और नई पीढ़ी को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराती है।
सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण
जुड़ शीतल पर्व मैथिली संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को दर्शाता है। यह त्योहार लोगों को न केवल अपने रीति-रिवाजों से जोड़ता है, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने की सीख भी देता है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यह पर्व आज भी अपनी खास पहचान बनाए हुए है।
,








