होलिका दहन 2026: जानें प्रह्लाद और होलिका की कथा, क्यों मनाया जाता है यह पर्व

स्पेशल स्टोरी : होलिका दहन भारतीय परंपरा का एक प्रमुख पर्व है, जो असत्य और अधर्म पर सत्य की जीत का संदेश देता है। यह त्योहार हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन हमें भय, अहंकार और नकारात्मकता को त्यागकर आत्मिक परिवर्तन की प्रेरणा देता है।

हिरण्यकश्यप का अहंकार और वरदान

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि न उसे मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में उसकी मृत्यु हो, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; और न ही किसी अस्त्र-शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर भी रोक लगा दी।

प्रह्लाद की अटूट भक्ति

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। पिता के लाख विरोध के बावजूद उसने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने उसे कई बार मारने की कोशिश की—कभी विषैले सर्पों के बीच डलवाया, कभी हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का प्रयास किया, कभी ऊंचे पर्वत से गिरवाया और कभी समुद्र में फिंकवाया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।

होलिका की योजना और उसका अंत

जब सभी प्रयास विफल हो गए, तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना के अनुसार, होलिका ने प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता पर बैठना स्वीकार किया। लेकिन प्रह्लाद पूरी निष्ठा से भगवान का स्मरण करता रहा और तनिक भी भयभीत नहीं हुआ।

कथा के अनुसार, होलिका ने अपने वरदान का दुरुपयोग किया, जिसके परिणामस्वरूप वह अग्नि में भस्म हो गई। वहीं, अग्नि से रक्षा करने वाला दिव्य वस्त्र उड़कर प्रह्लाद को ढक गया और वह सुरक्षित बाहर निकल आया।

होलिका दहन का महत्व और रंगोत्सव

इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और भक्ति की शक्ति के आगे अधर्म और अहंकार टिक नहीं सकते। होलिका दहन के अगले दिन रंगों का त्योहार मनाया जाता है, जिसे रंगोत्सव या होली कहा जाता है। यह उत्सव प्रेम, भाईचारे और उल्लास का प्रतीक है।

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