ईरान संकट पर यूरोप की एंट्री: अमेरिका-इज़रायल के साथ ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी सख्त

न्यूज़ डेस्क : ईरान को लेकर पश्चिमी देशों का रुख और कड़ा हो गया है। अमेरिका और इज़रायल के बाद अब यूरोप के प्रमुख देश भी खुलकर सामने आ गए हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वे खाड़ी क्षेत्र में अपने हितों और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए ईरान के खिलाफ “रक्षात्मक कार्रवाई” करने से पीछे नहीं हटेंगे। यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं।

संयुक्त बयान में ईरान के हमलों की कड़ी निंदा

तीनों यूरोपीय देशों के नेताओं ने कहा कि वे ईरान द्वारा किए जा रहे “अंधाधुंध और असंगत” मिसाइल हमलों से स्तब्ध हैं। उनके अनुसार, इन हमलों में वे देश भी निशाना बने हैं जो अमेरिका और इज़रायल की शुरुआती सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं थे। बयान में कहा गया कि ईरान के इन हमलों से क्षेत्र में तैनात सैन्य कर्मियों और आम नागरिकों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हुआ है।

नेताओं ने ईरान से तुरंत हमले रोकने की अपील की और चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे तो मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को उनके स्रोत पर ही निष्क्रिय करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर अमेरिका और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने पर सहमति बन चुकी है।

इराक और जॉर्डन में सैन्य ठिकाने बने निशाना

ईरान के हमलों का असर उत्तरी इराक के एरबिल के पास स्थित एक बहुराष्ट्रीय सैन्य अड्डे और जॉर्डन के पूर्वी हिस्से में जर्मन सेना के शिविर पर भी पड़ा। जर्मन सेना के प्रवक्ता ने मीडिया रिपोर्टों की पुष्टि करते हुए बताया कि इन हमलों में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, हालांकि स्थिति को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

ब्रिटेन ने बदला रुख, अमेरिकी सेना को दी ठिकानों की अनुमति

पहले इस संघर्ष में अमेरिका को किसी भी तरह की मदद देने से इनकार करने वाला ब्रिटेन अब बदली परिस्थितियों में साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने घोषणा की कि अमेरिका को ब्रिटिश सैन्य ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति दी जाएगी, ताकि ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाकर आगे के हमलों को रोका जा सके।

स्टारमर ने साफ किया कि अमेरिका-इज़रायल द्वारा किए गए शुरुआती हमलों में ब्रिटेन की कोई भूमिका नहीं थी और वह किसी आक्रामक कार्रवाई में शामिल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह कदम “सामूहिक आत्मरक्षा” के सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप उठाया जा रहा है। साथ ही सरकार अपने कानूनी परामर्श का सार सार्वजनिक करेगी।

ईरान पर अमेरिका-इज़रायल का बड़ा हमला

शनिवार तड़के अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर व्यापक सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसमें ईरान को भारी नुकसान पहुंचा। रिपोर्टों के मुताबिक, हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है और मरने वालों की संख्या 200 से अधिक बताई जा रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ के तहत ईरान का जवाबी हमला

हमलों के जवाब में ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ शुरू किया, जिसके तहत अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उन देशों को निशाना बनाया गया जहां अमेरिकी सेनाएं तैनात हैं। इनमें बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक शामिल हैं। यरुशलम और तेल अवीव में भी धमाकों की खबरें आई हैं।

इज़रायली बचाव एजेंसियों के अनुसार, बेत शेमेश शहर में कम से कम नौ लोगों की मौत हुई है। दूसरी ओर, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने खामेनेई की हत्या को “मुसलमानों के खिलाफ युद्ध की घोषणा” बताया और कड़ा बदला लेने की चेतावनी दी। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान अपने लोगों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा।

अमेरिका की चेतावनी और बढ़ता तनाव

अमेरिका की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया आई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि ईरान हमले बंद नहीं करता तो उसे ऐसे हमले का सामना करना पड़ेगा जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा।

इस बीच, ईरान के जवाबी हमलों में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत और पांच के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। क्षेत्र में तनाव चरम पर है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब आगे की घटनाओं पर टिकी हैं।

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