न्यूज़ डेस्क: भारतीय त्यौहार केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि संस्कार और परंपरा का संगम भी होते हैं। होली सिर्फ रंग और मिठाइयों का त्योहार नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई रुढ़िवादी मान्यताएं और रस्में भी जुड़ी हैं। खासकर शादी के बाद आने वाली पहली होली को लेकर एक बहुत ही रोचक परंपरा प्रचलित है।
पहली होली मायके में क्यों?
नई नवेली दुल्हन अपनी पहली होली ससुराल में नहीं, बल्कि अपने मायके (पीहर) आकर मनाती है। इसका मुख्य कारण परंपरा और मान्यता से जुड़ा है। बुजुर्गों का मानना है कि शादी के तुरंत बाद होलिका दहन देखना नवविवाहिताओं के लिए शुभ नहीं होता।
होलिका दहन और मान्यता

- होलिका दहन को “होलिका की चिता” कहा जाता है। शादी के मांगलिक आयोजनों के तुरंत बाद इस चिता के सामने खड़ा होना अशुभ माना जाता है।
- ऐसा माना जाता है कि अगर नई बहू और सास एक साथ होलिका की अग्नि देखें, तो रिश्तों में तनाव और कड़वाहट पैदा हो सकती है।
- वहीं, यदि नवविवाहिता गर्भवती हो, तो होलिका की गर्मी और धुआं उसके और होने वाले बच्चे के लिए ठीक नहीं माना जाता।
मायके में रहकर होने वाले फायदे
- पहली होली पर मायके में रहना नवविवाहिता को आराम और देखभाल देता है।
- यह अवसर उसे अपने पुराने माहौल और परिवार के साथ समय बिताने का मौका देता है, जिससे वह मानसिक रूप से खुश रहती है।
- साथ ही, दामाद जब ससुराल आता है, तो वह वहां के लोगों के साथ अपने रिश्तों को मजबूत कर सकता है।
पहली होली मायके में मनाने का रिवाज सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि संस्कार, सुरक्षा और रिश्तों के सौहार्द का प्रतीक है। यह परंपरा नवविवाहिता को सुरक्षित और खुशहाल वातावरण प्रदान करती है और उसके रिश्तों में सामंजस्य बनाए रखने में मदद करती है।








