न्यूज डेस्क: आज शुक्रवार को बसंत पंचमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा और आराधना के लिए समर्पित होता है। माता सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि, वाणी और संगीत की देवी माना जाता है। मान्यता है कि उनकी कृपा के बिना सच्चे ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है, इसलिए विद्यार्थी इस दिन विशेष श्रद्धा से पूजा करते हैं।
सरस्वती पूजा और बसंत ऋतु का उत्सव
बसंत पंचमी को माँ सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, देवी सरस्वती माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रकट हुई थीं। यह पर्व अज्ञान को दूर करने, ज्ञान को अपनाने और बसंत ऋतु के आगमन का उत्सव मनाने का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्रकृति की सुंदरता और समृद्धि को दर्शाती है।
पौराणिक कथा: माता सरस्वती का प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय चारों ओर मौन और नीरवता थी। तब भगवान ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल निकालकर मंत्रोच्चार के साथ उसका छिड़काव किया। उसी जल से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिन्हें बाद में माता सरस्वती के रूप में जाना गया।
भगवान श्रीकृष्ण और माता सरस्वती की कथा
कथा के अनुसार, जब माता सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण को देखा, तो उनके मन में उन्हें पति रूप में पाने की इच्छा जागी। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने सम्मानपूर्वक बताया कि वे राधा जी के प्रति समर्पित हैं, जो माता लक्ष्मी का स्वरूप हैं, इसलिए वे इस इच्छा को स्वीकार नहीं कर सकते।
वरदान और सरस्वती पूजा की परंपरा
माता सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि हर वर्ष उनके प्रकट होने की तिथि, यानी माघ शुक्ल पंचमी को उनकी विशेष पूजा की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि युगों-युगों तक समस्त प्राणी श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना करेंगे।
संपूर्ण सृष्टि द्वारा देवी सरस्वती की आराधना
मान्यता है कि मनुष्य, देवता, ऋषि-मुनि, योगी, नाग, गंधर्व और अन्य सभी प्राणी सोलह प्रकार की पूजा-विधियों के माध्यम से माता सरस्वती की उपासना करेंगे। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं सबसे पहले उनकी पूजा की, जिसके बाद यह परंपरा प्रारंभ हुई और आज तक निभाई जा रही है।
