आस्था,सुख-समृद्धि और सूर्य उपासना का महापर्व, जानिए छठ से जुड़ी पौराणिक कथा

न्यूज डेस्क: हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व होता है। आस्था का यह महापर्व बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाता है। हालांकि अब देश के हर कोने में छठ पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का विशेष विधान है। चार दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान की शुरुआत 25 अक्टूबर से नहाय-खाय से हुई और इसका समापन 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ होगा।

28 अक्टूबर को होगा समापन

चार दिनों तक चलने वाला छठ महापर्व का आज यानी 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा। जब व्रती नदी, तालाब या घाट पर सूर्यास्त के समय अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। अगले दिन 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। यही छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है। इस दौरान महिलाएं और पुरुष दोनों सूर्य देव और छठी मैया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्रीराम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद सूर्य देव की उपासना की थी। वहीं, द्वापर युग में कर्ण और द्रौपदी ने भी सूर्य देव की आराधना की थी। इसके अलावा राजा प्रियंवद द्वारा की गई पूजा से छठ महापर्व का आरंभ माना जाता है।

जानिए कैसे हुई छठ पूजा की शुरुआत

छठ पूजा की एक पौराणिक कथा राजा प्रियंवद और रानी मालिनी से संबंधित है। कहा जाता है कि राजा प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत दुखी थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के साथ महर्षि कश्यप के मार्गदर्शन में यज्ञ किया। यज्ञ के बाद रानी ने खीर का प्रसाद ग्रहण किया और गर्भवती हुईं, लेकिन दुर्भाग्यवश एक मृत पुत्र को जन्म दिया।

इस दुख से व्याकुल होकर राजा प्रियव्रत ने अपने जीवन का अंत करने का निश्चय किया। तभी उनके सामने एक दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने कहा – “मैं ब्रह्मा जी की पुत्री और सृष्टि की छठी शक्ति हूं, इसलिए मुझे षष्ठी देवी या छठी मैया कहा जाता है।” देवी ने राजा से कहा कि यदि वे उनकी आराधना करेंगे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे, तो उन्हें संतान सुख अवश्य मिलेगा। राजा प्रियव्रत ने कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को देवी षष्ठी की विधिवत पूजा की। परिणामस्वरूप उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से इस दिन छठी मैया की पूजा करने की परंपरा शुरू हो गई।

माता सीता ने की थी सूर्य देव की पूजा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने के बाद छठ व्रत की शुरुआत हुई। लंकापति रावण का वध करने के बाद श्रीराम को ब्रह्महत्या का पाप लगा था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों से उपाय पूछा। तब ऋषि मुग्दल ने उन्हें कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य देव की आराधना करने का निर्देश दिया। श्रीराम और माता सीता ने छह दिनों तक मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा की। तभी से यह परंपरा लोक आस्था में छठ पर्व के रूप में मनाई जाने लगी।

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