असम में 10 दिन तक चुनावी दौरा, हेमंत सोरेन ने बीजेपी पर साधा निशाना

रांची /असम : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन ने असम में दस दिन तक सक्रिय चुनावी अभियान चलाया। इस दौरान दोनों ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रत्याशियों के समर्थन में कई रैलियां और सभा आयोजित की। मंगलवार की शाम अभियान समाप्त होने के बाद हेमंत सोरेन रांची लौट आए।

बीजेपी पर तीखे हमले जारी

असम से लौटने के बाद भी हेमंत सोरेन ने अपने तीखे बयान जारी रखे। उन्होंने ट्वीट के जरिए असम के चाय बागानों में काम कर रहे आदिवासियों के हालात को लेकर बीजेपी सरकार की आलोचना की।

आदिवासियों के संघर्ष पर जोर

हेमंत सोरेन ने ट्वीट में लिखा कि आदिवासियों ने कभी अंग्रेजों के सामने सिर नहीं झुकाया। सदियों तक जंगल, पानी और जमीन की रक्षा के लिए उन्होंने संघर्ष किया और अपनी आत्म-सम्मान को कभी नहीं बेचा। आज भी उन्हें अपने ही देश में अपने अधिकार और पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

लोकतंत्र में यह एक चुनौती

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह केवल एक सवाल नहीं है, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आईने में झलकती सच्चाई है। आदिवासी समुदाय जिनने पहले ब्रिटिश शासन के खिलाफ निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं—चाहे संथाल हुल हो या बिरसा मुंडा का उलगुलान—वे आज अपने संविधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

पोस्टरों के जरिए वोट की अपील

असमी और हिंदी भाषा में किए गए पोस्टरों के माध्यम से हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी नागरिकों से झामुमो को वोट देने की अपील की। पोस्टरों में “जोहार” नमस्कार के साथ उनके अधिकार और सम्मान के प्रति जागरूक करने का संदेश भी दिया गया।

पार्टी की सक्रिय रणनीति

झामुमो नेताओं के अनुसार, असम अभियान का उद्देश्य केवल प्रचार नहीं बल्कि आदिवासी समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करना और उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों की याद दिलाना भी था।

आदिवासी मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर लाना

हेमंत सोरेन का यह अभियान आदिवासियों के अधिकारों को राष्ट्रीय मंच पर लाने और उनके हितों के लिए आवाज उठाने का प्रयास भी माना जा रहा है। उन्होंने अपने संदेश के जरिए लोकतांत्रिक सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय पर जोर दिया।

राजनीतिक गलियारों में हलचल

इस चुनावी दौरे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। हेमंत सोरेन के तीखे बयान और अभियान ने बीजेपी पर सवाल खड़े किए हैं, और असम में आदिवासी मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिशों को तेज कर दिया है।

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