पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए सुहागिनें रखती हैं करवा चौथ का व्रत”

न्यूज डेस्क: आई रात सुहागों वाली… चांद को देखू व्रत में अपना खोलू…जी हां आज सुहागो वाली रात है। आज हर सुहागन अपने पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है।

हिंदू पंचाग के अनुसार करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है ।हर सुहागन महिलाएं सुबह से लेकर रात तक निर्जला व्रत में रहती है। रात में चांद निकलने पर चांद का दर्शन करती है, और अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती है।

करवा चौथ की पूजा

करवा चौथ के दिन सुहागिन 16 श्रृंगार करके तैयार होती है। दीवार पर करवा माता का चित्र बनाती है। चावल के आटे में हल्दी मिलाकर जमीन पर चित्र बनाती है। जमीन में बनी इस चित्र के ऊपर करवा रखती है और इसके ऊपर घी का दीपक जलाती है।

इसके बाद करवा पर मीठे पूरी, मिठाई , आटे का हलवा , लौटे में पानी रख के चढ़ाती है और पूरी विधि विधान से पूजा पाठ करती है। इसके बाद चांद निकलने पर चंद्रमा को अर्घ्य देती है और छन्नी से चांद को देखकर फिर अपने पति को देखती हैं और अपना व्रत खोलती है। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से व्रती के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है।

छलनी से क्यों देखा जाता है

ऐसा माना जाता है कि छन्नी में कई छेद होते हैं। जब इससे चांद को देखा जाता तो इससे कई प्रतिबिंब बनते हैं । इसके बाद छन्नी से पति का चेहरा देखा जाता है और माना जाता है इस दौरान जितने प्रतिबिंब दिखते हैं पति की आयु इतनी लंबी होती है। करवा चौथ इस रस्म के बिना अधूरा है। मनचाहा वर पाने के लिए कई अविवाहित स्त्रियां भी करवा चौथ का व्रत करती है।

करवा चौथ की कहानी

प्राचीनकाल में एक साहुकार के सात पुत्र और एक पुत्री थी। जब पुत्री बड़ी हुई तो उसका विवाह कर दिया गया। जब कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी आई तो कन्या ने करवा चौथ का व्रत रखा। लेकिन सात भाइयों की लाडली बहन को चंद्रोदय से पहले ही भूख सताने लगी। उसका मुरझाया हुआ चेहरा उसके भाइयों से देखा नहीं गया।

उन्होंने अपनी बहन से चंद्रोदय से पहले ही भोजन करने को कहा लेकिन वह नहीं मानी। उसने कहा जब तक चांद नहीं निकलेगा वह भोजन नहीं करेगी। तब भाइयों ने एक योजना बनाई और पीपल के वृक्ष की आड़ में प्रकाश करके कहा- देखो ! चंद्रोदय हो गया। उठो, अर्घ्य देकर भोजन करो। बहन भाइयों की ये चाल समझ नहीं पाई और उसने नकली चांद को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लिया। भोजन करते ही उसका पति मर गया। वह रोने चिल्लाने लगी। दैवयोग से उस समय इन्द्राणी देवदासियों के साथ वहां से जा रही थीं। रोने की आवाज सुन कर वह साहुकार की पुत्री के पास गईं और उससे रोने का कारण पूछा।

पति के लिए 12 माह किया व्रत

उस कन्या ने सारी कहानी सुनाया। तब इन्द्राणी ने कहा- ‘तुमने करवा चौथ के व्रत में चंद्रोदय से पूर्व ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया, इस कारण ही ऐसा हुआ है। अब यदि तुम मृत पति की सेवा करती हुई बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को यथाविधि व्रत करोगी, फिर करवा चौथ को विधिवत गौरी, शिव, गणेश, कार्तिकेय सहित चंद्रमा का विधिवत पूजन करोगी और चंद्र उदय के बाद अर्ध्य देकर अन्न-जल ग्रहण करोगी तो तुम्हारे पति अवश्य जीवित हो उठेंगे।’

कन्या ने ठीक ऐसा ही किया। उसने 12 माह की चौथ सहित विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनका मृत पति जीवित हो गया। कहते हैं जो भी महिला करवा चौथ का व्रत विधि विधान रखती है उसके पति को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

मगरमच्छ से बचाई अपने पति की जान

वही एक और कहानी के अनुसार एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गांव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया ।

वह मनुष्य करवा करवा कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भाग चली आई और मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध दिया ।मगरमच्छ को बांधकर यमराज के यहां पहुंची और यमराज से कहने लगी , हे भगवान मगरमच्छ ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उसे मगरमच्छ को पैर पकड़ने की अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ। इस पर यमराज बोले अभी मगरमच्छ की आयु शेष है अतः मैं उसे नहीं मार सकता । इस बार करवा बोली अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आपको श्राप देकर नष्ट कर दूंगी। यह सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगरमच्छ को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी।


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