न्यूज डेस्क: मिथिला शुरू से ही अपनी अनोखी परंपरा और संस्कृति के लिए जानी जाती है। मिथिला में ऐसे कई पर्व त्यौहार है , जिसे कई लोग नहीं जानते हैं। जो सिर्फ मिथिलावासी ही मानते हैं। उन्हीं में से एक पर्व है चौरचन पर्व , जिसे चारचन्ना पाबनी , चौथ चांद या चौथ चंद्र या चोरचन पूजा के नाम से भी जाना जाता है।
यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। चौरचन भारत और नेपाल के मिथिला क्षेत्र का विशेष त्योहार है। मिथिला में विवाहित महिलाओं के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण व्रत है।
चंद्र देव को दिया जाता है अर्घ्य

चौरचन पर्व चंद्र देव और भगवान गणेश को समर्पित है। जिसका मिथिला में बहुत ही धार्मिक महत्व है। यह छठ पूजा की तरह मनाया जाता है, बस खास बात यह होती है कि छठ पूजा में हम भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं और चौरचन में हम चंद्र देव को अर्घ्य देते हैं। यह दही और फल से दिया जाता है।
चतुर्थी की चांद श्रापित
ऐसा कहा जाता है कि चतुर्थी की चांद को देखना शुभ नहीं होता है। इस दिन चांद देखने से कलंक लगता है। इस दिन चांद को श्रापित कहा जाता है। लेकिन जिस चांद को लोग श्रापित मानते है, और नहीं देखते, वहीं दूसरी तरफ मिथिला में चतुर्थी को चांद को देख कर मिथिला के लोग उनकी पूजा करते है। ताकि जीवन में सुख समृद्धि बने रहे।
कैसे की जाती है पूजा

भूमि पर चंद्रमा की आकृति बनाई जाती है। उसके ऊपर केले का पत्ता रख कर नैवेद्य चढ़ाया जाता है। मिट्टी के बर्तन में दही रखा जाता है, वहीं बांस के टोकरी में फल रखा जाता है। जिसे परिवार के हर सदस्य अपने हाथ में एक फल ले के चंद्र देव को प्रणाम करते है। माना जाता है कि इस दिन चन्द्रमा का दर्शन करने से परिवार में शांति, समृद्धि और दोषों का निवारण होता है।
क्यों भगवान गणेश ने दिया श्राप
पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा कहा गया है कि एक बार भगवान गणेश अपने वाहन मूषक के साथ कैलाश पर भ्रमण कर रहे थे। जिसे देखकर चंद्र देव खूब हंसे। इस पर भगवान गणेश ने उनसे पूछा कि वह क्यों हंस रहे हैं? चंद्रदेव ने कहा कि उनका यह विचित्र रूप देखकर उन्हें हंसी आ रही है ।

इसे देखकर गणेश भगवान बहुत ही क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्र देव को श्राप दिया कि तुम्हे अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड है , आज से तुम कुरूप हो जाओगे । जो कोई भी तुम्हें देखेगा उस पर झूठा कलंक लगेगा। वह अपराधी कहलाएगा जबकि उसने कोई अपराध नहीं किया होगा।
इसके बाद चंद्र देव ने भगवान गणेश से क्षमा मांगी। चंद्र देव की पश्चाताप को देखकर भगवान गणेश ने उन्हें क्षमा कर दिया। इसलिए कहा जाता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चांद को नहीं देखना चाहिए लेकिन मिथिला वासी इससे बचने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन शाम में चंद्रमा की पूजा करते हैं।
